सातार तट में चंद्रशेखर आज़ाद

युवाओं की प्रेरणा का केंद्र बना सातार तट

चंद्रशेखर आजाद का  सातार तट से गहरा नाता है आजादी की लड़ाई में काकोरी कांड के बाद अपना अज्ञातवास सातार तट पर गुजारा।
उत्तर प्रदेश के काकोरी कांड में चंद्रशेखर आजाद शामिल थे काकोरी कांड मैं सहारनपुर लखनऊ सवारी गाड़ी से अंग्रेजों का खजाना लूट लिया गया था। क्रांतिकारियों को आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए पैसों की आवश्यकता थी तब क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों का खजाना लूटने की योजना बनाई थी चंद्रशेखर आजाद काकोरी कांड की घटना के बाद 1925 में झांसी आ गए और उन्होंने अपना नया ठिकाना ओरछा से 6 किलोमीटर दूर   सातार  नदी के तट पर बनाया।
 चंद्रशेखर आजाद जिस कुटिया में ठहरे थे उस घास की कुटिया का निर्माण उन्होंने स्वयं ही किया था, उस कुटिया में सोने के लिए मिट्टी का पलंग उन्होंने ही बनाया था वह मिट्टी के तकिए का ही प्रयोग करते थे। चंद्रशेखर आजाद  सातार तट पर सन्यासी बन कर रहे। अज्ञातवास के दौरान उनका नाम हरी शंकर ब्रह्मचारी रहा यह नाम उन्हें क्रांतिकारी रूद्र नारायण ने दिया डेढ़ वर्ष तक उन्हें कोई पहचान नहीं सका। 1925 से 1927 तक उन्होंने अपनी गतिविधियों का संचालन सातार तट से संचालित किया। चंद्रशेखर आजाद ने  सातार तट पर स्वयं एक छोटा सा कुआं खोदा जो आज भी विद्यमान है। चंद्रशेखर आजाद हनुमान जी के परम भक्त थे उन्होंने सातार नदी के तट पर अपनी कुटिया के सामने एक हनुमान जी का मंदिर भी स्वयं निर्मित किया।
आजाद का नजदीक के गांव ढीमरपुरा के मलखान सिंह ठाकुर के घर आना जाना था। इस गांव का नाम अब आजादपुरा है। मलखान सिंह की पहचान पंजा लड़ाने वाले पहलवान की थी लेकिन चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें पंजा लड़ाने में हरा दिया जिससे आजाद की कीर्ति आस-पास के गांव में फैल गई।
 सातार के जंगलों में चंद्रशेखर आजाद गुरिल्ला युद्ध का अभ्यास करते थे इसी जंगल में अपने क्रांतिकारी साथियों को शिकार के बहाने हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया करते थे
चंद्रशेखर आजाद के धैर्यशील स्वभाव और संगठन क्षमता के कारण संगठन का नेतृत्व आजाद के ही हाथों में रहा। सातार तट पर हर रोज झांसी से सदाशिवराव और दूसरे साथी काकोरी कांड की अदालती कार्यवाही और दूसरी क्रांतिकारी गतिविधियों की जानकारी अखबारों की कतरन के रूप में आजाद को दिया करते थे
चंद्रशेखर आजाद सातार तट पर अपने झांसी के क्रांतिकारी साथियों को बुलाकर काकोरी कांड के बाद टूटे हुए सूत्रों को फिर से जोड़ने में लग गए संगठन के कई कार्यक्रमों का संचालन सातार तट से किया जाने लगा। चंद्रशेखर आजाद ने आसपास के गांव के बच्चों को पढ़ाने का कार्य भी किया
सातार  नदी के तट पर उन्होंने अपना डेढ़ वर्ष का अज्ञातवास काटा यहां वह हरिशंकर ब्रह्मचारी के छद्म नाम से रहे। गुरिल्ला युद्ध वह हथियार चलाने का प्रशिक्षण अपने क्रांतिकारी साथियों को दिया
31 मई 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चंद्रशेखर आजाद की आदमकद कांस्य प्रतिमा लगवाई। स्वयं उसका लोकार्पण करने आई, तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस स्थान को आजाद स्मारक घोषित किया।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक डॉ. पवन तिवारी जी ने इस स्मारक में दो कलश स्थापित किए।
 एक कलश में उनके जन्म स्थान भावरा जिला झाबुआ  की मिट्टी है तो दूसरे कलश में अल्फ्रेड पार्क प्रयागराज की मिट्टी है जहां उन्होंने मैं आजाद था आजाद हूं और आजाद रहूंगा कहते हुए स्वयं को गोली मारकर अपनी अंतिम सांस ली थी। इस स्मारक में आजाद की पिस्तौल भी रखी हुई है। नानाजी देशमुख स्मृति पुस्तकालय का निर्माण भी कराया गया। यहां पर चंद्रशेखर आजाद से संबंधित साहित्य उपलब्ध है।

सातार तट आज युवाओं को प्रेरणा देने का कार्य कर रहा है इस स्थान पर आने के बाद युवाओं के मन में देश के प्रति कुछ कर गुजर जाने की प्रेरणा मिलती है। देश के युवाओं को प्रेरणा देने व युवाओं में देशभक्ति की भावना जगाने का कार्य सातार तट से हो रहा है।

सातार तट झाँसी (उ.प्र.) से 10 कि. मि. की दूरी पर रामराज की नगरी ओरछा से 6 कि. मी. दूर मुख्य मार्ग पर स्थित है।

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