फिल्मो का राष्ट्रीयकरण या मोदीकरण

 


यह एक फिल्म "आरआरआर" का पोस्टर है... इस फिल्म ने परसों अपनी रिलीज के पहले दिन 257 करोड़ रुपए कमायें हैं जो किसी भी भारतीय फिल्म के लिए सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। इस फिल्म के निर्देशक एसएस राजामौली हैं जिनकी पिछ्ली दो फिल्मों "बाहुबली" ने सबसे अधिक कमाई का रिकॉर्ड बनाया था जो स्वयं राजामौली ने ही तोड़ दिया है...


इस बीच किसी करण जौहर या आदित्य चौपड़ा की कोई लिजलिजी फिल्म या शाहरुख सलमान आमिर सैफ अख्तर की कोई भी फिल्म 2016 के दिसम्बर के बाद से हिट नहीं हुई है... सारी कैटरिनायें, दीपिकायें, प्रियंकायें, आलियाएं अपने मोमजामे में वापस लौट गई हैं... पाकिस्तान के किसी सिंगर का कोई गाना या वहां के किसी जावेद फरहाद को भारत में पहले की तरह "सैटल्ड दीवानगी" नहीं मिल रही... इस बीच साउथ की "पुष्पा" ने भी भारत के दिल में फायर जगाई है... और 65 पार के साउथ वाले रजनीकांत आज भी "थलाइवा" बने हुए हैं उत्तर भारत में भी...


यह बात देश के सेक्युलर्स और बुद्धिजीवियों को खाए जा रही है कि "कहीं राजनेता नरेंद्र मोदी के वोटर अब फिल्मों का भी मोदीकरण तो नहीं कर रहे..." मेरा मानना है कि "हां ऐसा ही हो रहा है..." जो राजनेता दर्शकों की इस नब्ज को समझेंगे... उन्हें वोट मिलेंगे और जो फिल्मवाले इस फार्मूले को अपनाएंगे उन्हें दर्शक मिलेंगे करोड़ों-अरबों की कमाई मिलेगी... हाल ही आई बिना सितारों वाली एक छोटी सी मामूली सी फिल्म "कश्मीर फाइल्स" ने पूरे देश को बांध लिया अपने प्रेमपाश में...


भारत में अगली 10 हिट फिल्में केवल उन विषयों पर बनी हुई होगी, जिन विषयों पर मोदी देश से बात करते हैं... वे अगर कहते हैं कि राजा सुहेलदेव की जय हो... तो आप देख लेना आने वाली फिल्म "सुहेलदेव" 500 करोड़ रुपए कमायेगी... और दो साल बाद इन्हीं गर्मियों में मोदी के नाम पर ही देश 300 से अधिक करीब 350 राजनेताओं को अपनी मंजूरी देगा कि जाओ संसद में...


संभवतः दुनिया में समकालीन राजनीति में मोदी पहले राजनेता होंगे जो 140 करोड़ लोगों के बहु विविधता वाले देश में निरंतर 15 बरस राजसेवा करेंगे वो भी लोगों से वोटप्रेम पाकर... इस बीच फिल्म, त्योहार, पुस्तक, साहित्य, अखबार, टीवी, विज्ञापन, क्रिकेट, बाजार सब का मोदीकरण होगा... बिल्कुल होगा और यही देश हित में भी है।

शायद इसी का परिणाम है कि बॉलीवुड की फिल्में इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर रही हैं। नवंबर 2021 से अगर देखा जाए, तो ‘सूर्यवंशी’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ को छोड़कर कोई भी फिल्म अपना मूल बजट तक घरेलू बॉक्स ऑफिस पर रिकवर नहीं कर पाई। ‘83’, ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ और ‘बच्चन पाण्डेय’ तो सुपर फ्लॉप सिद्ध हुए, क्योंकि उनका एक तो मनोरंजन या कंटेंट से दूर तक कोई नाता नहीं और एजेंडावाद तो उसमें ठूंस ठूंस कर भरा हुआ था। वहीं, दूसरी तरफ चाहे ‘पुष्पा’ या फिर ‘RRR’ जैसी फिल्मों के जरिए तेलुगु फिल्म उद्योग के नेतृत्व में क्षेत्रीय सिनेमा ने भारतीय सिनेमा की एक ऐसी नई परिभाषा गढ़नी प्रारंभ कर दी है, जहां बॉलीवुड का वर्चस्व नहीं चलेगा, अपितु उसी फिल्म का प्रभुत्व होगा, जिसकी कहानी में दम होग, और अभी KGF–Chapter 2 की लहर तो बाकी है भैया!

ऐसे में इतना तो स्पष्ट है कि बॉलीवुड का अस्तित्व अब खतरे में है। निस्संदेह ‘शेरशाह’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ बनाने वाले अब भी उपस्थित है, लेकिन उनकी उपस्थिति लगभग नगण्य है और यदि बॉलीवुड को चलाने वाले नहीं सुधरे, तो आने वाले वर्षों में ‘कांग्रेस’ मुक्त भारत के समान एक दिन हमें बॉलीवुड मुक्त भारत भी देखने को मिल सकता है।




Comments

Bollywood agar nhi sudhara to uska ant nikat h
सही कहा आपने